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1000 एपिसोड से इतिहास रचने वाला 25 साल पुराना TV शो, रोने पर किया मजबूर, एक हफ्ते तक शोक में डूबे थे लोग

 Written By: Jaya Dwivedie @JDwivedie
 Published : May 06, 2026 05:32 pm IST,  Updated : May 06, 2026 05:32 pm IST

टीवी की दुनिया में कई शोज ऐसे हुए हैं जो सालों तक लोगों का मनोरंजन किए, 25 साल पहले भी एक ऐसा ही शो आया था, जिसकी कहानी ने लोगों को इस कदर रुलाया कि लोग एक हफ्ते तक शोक में डूबे रहे।

ek mahal ho sapno ka- India TV Hindi
एक महल हो सपनों का। Image Source : IMDB

भारतीय टेलीविजन के इतिहास में कई ऐसे धारावाहिक आए हैं जो सालों साल चले और इसके बाद भी लोग इनसे बोर नहीं हुआ, बल्कि ये दर्शकों के फेवरेट बने रहे। दर्शकों के साथ गहरे जुड़ाव के कारण ये शो सालों बाद भी पसंद किए जाते हैं।'क्योंकि सास भी कभी बहू थी' और 'ये रिश्ता क्या कहलाता है' जैसे शो दशकों तक चलते रहे, वहीं शुरुआती दौर में एक ऐसा सीरियल भी आया था जिसने कम समय में भी वह लोकप्रियता हासिल की जो आज के दौर के शो के लिए एक सपना है। यह कहानी एक ऐसे शो की है जिसकी लोकप्रियता ने न केवल रिकॉर्ड बनाए, बल्कि इसके एक नाटकीय मोड़ ने देशभर के दर्शकों को भावुक कर दिया था।

टेलीविजन का वह दौर और दर्शकों का जुड़ाव

90 के दशक के उत्तरार्ध और 2000 की शुरुआत का समय भारतीय टेलीविजन के लिए एक क्रांति जैसा था। उस दौर में दर्शक अपने पसंदीदा टीवी किरदारों के साथ इस कदर जुड़ जाते थे कि वे रील और रियल लाइफ का अंतर भूल बैठते थे। लोग किरदारों की खुशियों में हंसते थे और उनके दुखों में आंसू बहाते थे। इस दौर में कई डेली सोप ने अपनी धाक जमाई, लेकिन 'क्योंकि सास भी कभी बहू थी' जैसे लोकप्रिय शो के आने से ठीक पहले एक ऐसा धारावाहिक प्रसारित हुआ जिसने 1000 एपिसोड का ऐतिहासिक आंकड़ा पार कर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया था।

इतिहास रचने वाला शो

सोनी एंटरटेनमेंट टेलीविजन पर प्रसारित होने वाला धारावाहिक 'एक महल हो सपनों का' अपने समय का सबसे प्रतिष्ठित शो माना जाता था। इसकी शुरुआत 25 जनवरी, 1999 को हुई थी और यह 29 नवंबर, 2002 को समाप्त हुआ। लगभग 2 साल और 10 महीने के सफर में इस शो ने भारतीय दर्शकों के दिलों पर राज किया। यह शो मूल रूप से प्रसिद्ध गुजराती धारावाहिक 'सपना ना ववेतार' का हिंदी रीमेक था, जो 1996-97 के दौरान दूरदर्शन के गुजराती चैनल पर आता था। हालांकि, हिंदी संस्करण ने अपने मूल शो की तुलना में कहीं अधिक लंबी पारी खेली और अधिक ख्याति प्राप्त की।

कहानी और किरदारों का जादू

इस धारावाहिक का निर्देशन विपुल शाह ने किया था। कहानी एक बड़े परिवार और उसके चार बेटों के जीवन के इर्द-गिर्द बुनी गई थी। इनमें से 'शेखर' नाम का पात्र घर का सबसे जिम्मेदार और लाड़ला बेटा था। शो की लोकप्रियता का आलम यह था कि इसके प्रसारण के समय लोग अपनी दुकानें तक बंद कर देते थे ताकि एक भी दृश्य छूट न जाए। इस धारावाहिक में राजीव मेहता और सुप्रिया पाठक जैसे दिग्गजों ने पहली बार एक साथ स्क्रीन साझा की थी, जिन्हें बाद में 'खिचड़ी' में प्रफुल्ल और हंसा के रूप में बेहद प्यार मिला। इनके अलावा अजीत वच्छानी, दीना पाठक, रसिक दवे, मनोज जोशी और वंदना पाठक जैसे मंझे हुए कलाकारों ने भी मुख्य भूमिकाएं निभाई थीं।

जब एक किरदार की मौत पर हुआ 'शोक'

निर्देशक विपुल शाह ने एक बार साझा किया था कि जब शो के 300 एपिसोड पूरे होने वाले थे, तब उन्होंने कहानी में एक बड़ा ट्विस्ट लाने के उद्देश्य से दर्शकों के चहेते किरदार 'शेखर' की मृत्यु दिखा दी। यह प्रयोग इतना प्रभावशाली और हृदयविदारक रहा कि देश के कई हिस्सों में दर्शकों ने शेखर की मृत्यु को व्यक्तिगत क्षति मानते हुए शोक सभाएं आयोजित कीं। यह शोक का सिलसिला केवल एक दिन नहीं, बल्कि सात से आठ दिनों तक लगातार चलता रहा। यह घटना इस बात का प्रमाण है कि तत्कालीन दर्शक अपने धारावाहिकों को केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि अपने जीवन का अटूट हिस्सा मानते थे।

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